अध्ययनकर्ता व संवाद रचियता
प्रदीप गोल्याण (M.B.A., std. Ph.D), रिसर्च फैलो, गु० ज० वि०, हिसार
संग्रहकर्ता
1. सत्यपाल बुडायन, सचिव, कोपरेटिव बैंक, किठाना
2. विजय धीमान, एस० ए०, हरि० वि० प्र० नि०, जीन्द
Jh विश्वकर्मा समाज ने जितना संधर्ष किया, उतना परिणाम सामने नही आया। अभी इस समाज मे संतोषजनक जागृति नही आई है। अगर विश्वकर्मा हमारे निर्माता है।, तो हम समाज के निर्माता है। नए वातावरण व आधुनिक कंप्युटरीकृत युग मे हमे देखना है की समाज का निर्माण कैसे करना है (महेन्द्र सिह पंचाल, 2007)? हम विश्वकर्मावंशी महान सामाजिक प्राणी हैं। समाज के सभी प्राणीयों का जीवन सुखीमय बनाने में हमारा महान योगदान है। हमने अपने बुद्धि कौशल तथा अथक प्रयास से वास्तुकला, आधुनिक आविष्कार व वैजानिक तकनीकों का विकास किया है। इतना महान सामाजिक प्राणी होते हुए भी हमारा समाज प्रगति की दौड व विकास मे अन्य जातियों से पिछड क्यों रहा है? यह एक विचारणीय विषय है।
अतः हमारा सवाल है कि धीमान समाज के विकास को प्रभावित करने वाले कारक कौन से है जो धीमान समाज के पिछडने का कारण है?
अध्ययन पद्धति
सामाजिक समस्याओं का माप - दो आधार
1) सांस्कृतिक दृष्टिकोण से सामाजिक समस्याओं का माप लोगो के मूल्य निर्णय ही हैं। प्रत्येक समाज के अपने कुछ मूल्य, आदर्श, नैतिक नियम होते है। इन्ही को मापदण्ड के रुप मे प्रयोग किया जाता है।
2) सामाजिक समस्याओं का सांख्यिकीय माप भी सम्भव है। आधुनिक समय मे सरकारी व गैरसरकारी संस्थानों द्वारा विभिन्न सामाजिक समस्याओं के सम्बन्ध मे आंकडे एकत्रित किए जाते हैं उन आंकडों की सहायता से हम अधिकांश सामाजिक समस्याओं की गम्भीरता को माप सकते है।
अतः इस अध्ययन को दो भागों मे विभाजीत किया गया है प्रथंम भाग मे समाज के पास सामाजिक साहित्य की कमी को देखते हुए समाज के बुद्धिजीवि, दार्शनिक, चिंतक, समाजसेवी, वरिष्ट नेतृत्व, संपादक व पत्रकारों के विचारों, आलेख व सुझावों के माध्यम से धीमान समाज मे प्रचलित सांस्कृतिक मापदण्ड जैसे सामाजिक मूल्य, आदर्श, नैतिक नियम आदि की वरीयता पर अध्ययन किया गया है इन्ही के आधार पर धीमान समाज मे विध्यमान दस उपकल्पनाओं को परिभषित किया गया है।
द्वितिय भाग मे दस उपकल्पनाओं पर सांख्यिकीय तकनीकों के द्वारा विभिन्न सामाजिक समस्याओं के सम्बन्ध मे धीमान समाज के 110 प्रतिवादियों से आंकडे एकत्रित कर उनका विश्लेषण किया गया है वर्तमान अध्ययन मे प्राथमिक आकडे प्रश्नपत्र के माध्यम से प्राप्त किए गए हैं।
अध्ययन की उपयोगिता
अध्ययन की उपयोगिता इस बात से मानी जाती है कि उसमें कितने संदर्भ प्रयोग किये गये है व अध्ययन के लिए कौन सी तकनीक का प्रयोग किया गया है। अध्ययन की उपयोगिता तथ्यों पर भी आधारित होती है। वर्तमान अध्ययन को दो भागों मे विभाजित धीमान समाज मे प्रचलित सांस्कृतिक मापदण्ड व सांख्यिकीय तकनीकों के द्वारा विभिन्न सामाजिक समस्याओं के सम्बन्ध मे धीमान समाज के 110 प्रतिवादियों से आंकडे एकत्रित कर उनका विश्लेषण किया गया है। धीमान समाज मे प्रचलित सांस्कृतिक मापदण्डों के लिए 16 संदर्भ प्रयोग किये गये है। सांख्यिकीय तकनीकों मे औसत, मानक विचलन व कारक विश्लेषण आदि का प्रयोग किया गया है। इस अध्ययन के तथ्य धीमान समाज के बुद्धिजीवि वर्ग से मेल खाते है। अध्ययन के प्रस्ताव समाज के वरिष्ठ नेतृत्व व बुद्धिजीवि वर्ग को समाज मे व्यापक सामाजिक समस्याओं का समाधान कर समाज के विकास के लिए नितियां बनाने व विभिन्न संगठनो के उदेश्य निर्धारित करने के लिए किया जा सकता है। यह अध्ययन भविष्य मे किये जाने वाले अध्ययनों के लिए एक आधार व दिशा प्रदान करने मे सक्षम है अतः अन्य अध्ययनकर्ता भी इसका प्रयोग कर सकते हैं
सामाजिक समस्या एक ऐसी अवस्था होती है जिसे की समाज के काफी लोग अवांछनिय मानते हैं इस लिए ये लोग यह विश्वास करते है कि उस परिस्थिति के विषय मे कुछ न कुछ अवश्य ही करना चाहिए। इसका तात्पर्य यही हुआ कि संस्कृति से उपलब्ध हमारा मूल्य निर्णय कुछ अवस्थाओं को सामाजिक समस्या के रुप मे परिभाषित करता है। (रिचार्ड सी. फुलर) सामाजिक समस्या का सम्बन्ध किसी व्यक्ति विशेष के व्यवहार से नही अपितु समाज के बहुत से सदस्यों के किसी दुर्व्यवहार, कठिनाई, बुरे या अवांछनिय क्रियाकलाप से होता है। कौन सा व्यवहार बुरा या अवांछनिय है, इसका अन्तिम निर्णय समाज मे प्रचलित सांस्कृतिक मापदण्ड जैसे सामाजिक मूल्य, आदर्श, नैतिक नियम आदि के द्वारा ही होता है (सरला दुबे,1999)
पदमभूषण स्वामी कल्याण देव जी (2000) ने कहा कि गांव गांव तक छोटे बडे विश्वकर्मा स्कूल बनने चाहिए। उन्होने स्पष्ट भाषा मे उदघोष किया की अब मन्दिरों की नही स्कुलों तथा तकनीकी प्रशिक्षण केन्द्रों की जरुरत है। हमारा समाज शिक्षा के कारण ही पिछडा है। उन्होने आह्वान किया कि पूरे विश्वकर्मा समाज का एक ही संगठन बनना चाहिए तथा विश्वकर्मा जी को अपना गुरु मानकर कार्य करना चाहिए। उन्होने यह भी चेतावनी दी कि जब तक समाज महिलाओं को बराबर खडा नही करेगा, तब तक उन्नति नही होगी। रामशरण पांचाल युयुत्सु (2000) ने सचेत किया कि आज पुरा समाज अनेक घटकों मे विभाजित होकर जडता की और अग्रसर है। जो समाज की उन्नति मे तो बाधक है तथा समाज अपने लक्ष्यों से दूर होता जा रहा है। अभिभावकों को अपनी फिजूलखर्ची को सीमित करके बच्चों की उच्च शिक्षा पर ध्यान देना चाहिये। उन्होने आह्वान किया कि घर से यदि सम्भव ना हो तो कम से कम हर एक नगर व कस्बे से आई. ए. एस, इंजीनियर व डाक्टर बनने चाहिये। उन्होने अपील की समाज के सम्पन्न लोग एक एक बच्चे को सामाजिक तौर पर गोद लें तथा उन्हें पढ़ाने मे आर्थिक सहयोग उपलब्ध करायें।
हमारे नेताओं से समाज को दिशा बोध तब प्राप्त होगा, जब उनके आचरण मे सामाजिकता होगी। उनके ह्रदय मे समाज सेवा की आग होगी। जब आग है ही नही, तो उसका ताप कहां से प्रगट होगा। आप चाहते हैं संगठन करना और फिर अंतर मे विघटन का षडयत्र चल रहा हो संगठन खडा नही हो पायेगा। संगठन खडा करना, चलाना है तो संगठन का उदेश्य सर्व प्रथम सामने होना चाहिए। (डा लक्ष्मी निधि, 2006) समाज के नेता आजकल समाज मे अपनी चौधर के लिए अलग अलग गुट बनाए हुए है। अगर समाज मे नेताओं की ही आपस मे एकता नही होगी, तो ये समाज का कैसे भला करेंगे। (दिलबाग सिंह पांचाल, 2007) आज असंख्य सामाजिक संस्थाओं के प्रगति का यदि निष्पक्ष मूल्याकंन किया जाए तो परिणाम अपेक्षा के अनुरुप शायद ही मिले। अनेक कारणों से ये संस्थाएं प्राय निष्प्रभावी व शिथिलता को प्राप्त होती दिखाई पड रही हैं। किन्ही मे संकल्पों का अभाव खटक रहा है। किन्ही मे पारस्परिक सहयोग व सामंजस्य की कमी खल रही है। तो कंही कार्यकर्ताओं के मार्ग में अति महत्वकांक्षियों के जमघट अवरोध बन कर खडे है। इन विषम परिस्थितियों पर पार पाने के लिए संस्थाओं के शिखर नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। (इंद्रजीत शर्मा जगदेव, 2007)
आज के युग मे जहां हर तरफ झूठे, बेहुदा प्रभाव की चकाचौंध, वैश्वीकरण, राजनैतिक व परिदृशवी आदि है। ऐसे मे समाज को मजबूत व संगठित नही किया गया तो हमें अपनी संस्कृति, विचारधारा तथा समाज को अक्षुण बनाये रखने के लिए जबरदस्त पसीना बहाना पडेगा। समाज ऐसे सशक्त हाथों मे होना चाहिये कि यदि प्रलय भी आ जाय तो समाज एकजुट होकर कार्य करने के लिए तत्पर रहे। (अमर सिंह धीमान 2007) समाज को उच्च शिक्षा व कार्यदक्षता पर ध्यान देना चाहिये, समाज की आवश्यकता है कि हमारे लोगों मे नेतृत्व शक्ति का विकास हो, हमारा समाज सभी क्षेत्रों मे प्रवेश करे। यदि समय के साथ चलना है और शासन तथा सता पर अपना अधिकार लेना है तो संगठन शक्ति को बढ़ाना आज की प्रथंम आवश्यकता है (प्रदीप गोल्याण, 2007) संगठन के उदेश्यों के बारे में आम लोगों को जागरुक बनाएं। लोगों की समस्याओं को सुने व उन्हे सुलझाने का प्रयास करें तथा अधिक से अधिक समाज के लोगों से सम्पर्क करें। संगठन का नेतृत्व निस्वार्थ तथा पारदर्शी होना चाहिए। संगठन को चुस्त व कार्यशील रखने के लिए ब्लाक, तहसील, जिला व प्रदेश स्तर पर नियमित रुप से मीटिगों का आयोजन किया जाना चाहिए। (प्रेमसागर धीमान, 2007)
विश्वकर्मा समाज सदियों से पिछडा हुआ है जो लोग गावों मे रह रहे है। उनकी स्थिति तो और भी दयनीय है। अन्य कारण भी रहे होगें पर इस समाज के पिछडेपन का मुख्य कारण नशा है। हम समाज के उत्थान का उदेश्य हासिल तब तक नही कर सकते जब तक समाज के मान सम्मान को नष्ट करने लिए एक ही नशाखोर पर्याप्त है। (बचना राम धीमान, 2007) समाज मे जान की कमी के कारण ही आपसी झगडे, शराब व नशे का सेवन, दहेज की मांग जैसी कुरीतियों का प्रभाव बना रहता है। समाज मे मीडिया की बहुत कमी है। जो कुछ गिने चुने लोग पत्र पत्रिकाएं निकाल रहे है। वह सदा संकट मे रहते हैं। ये समाज की सेवा मे तो हैं। परन्तु उन्हे समाज का भरपूर सहयोग नही मिलता है। (माघी राम धीमान, 2007) किसी समाज की उन्नति व समृद्धि तब तक कोई अर्थ नही है जब तक समाज की बहन व बेटियां अशिक्षित हैं आज विश्वकर्मा समाज को अपनी बेटियों को अधिक से अधिक शिक्षित करने की नितांत आवश्यकता है। वर्तमान समय की यह मांग है कि हमारी बहने अपने धार्मिक, सामाजिक व महिला मण्डल आदि संगठन बनाए व विश्वकर्मा साहित्य अध्ययन कर इसका प्रचार प्रसार करें तांकि विश्वकर्मा समाज मे चेतना शक्ति और विकास का सुत्रपात हो सके। (सोमदत धीमान, 2007)
समाज के बुद्धिजीवि, दार्शनिक, चिंतक, समाजसेवी, वरिष्ट नेतृत्व, संपादक व पत्रकारों के विचारों, आलेख व सुझावों के माध्यम से धीमान समाज मे प्रचलित सांस्कृतिक मापदण्डों के आधार पर हमने पाया की समाज का यह बुद्धिजीवि वर्ग शिक्षा, उच्च शिक्षा, पारिवारिक समस्या, संगठन, संगठन कार्य प्रणाली, एकता शक्ति, भाईचारा, नेतृत्व गुण व नेतृत्व शैली, व नशे से सम्बन्धीत सामाजिक समस्याओं पर ज्यादा व्याख्या कर रहा है ftlds dkj.k ;g lekt vU; समाजों ls fiNMk gSaA अतः इनही विचारों, आलेख व सुझावों के आधार पर धीमान समाज मे विध्यमान दस उपकल्पनाओ को परिभाषित किया गया है। जिनका विवरण तालिका मे दिया गया है।
तालिका:- उपकल्पनाओ का विवरण
1.शिक्षा का स्तर बढ़ने से श्री विशवकर्मा धीमान समाज का विकास हुआ है
2.श्री विशवकर्मा धीमान समाज के विकास लिए बच्चों को उच्च शिक्षा न दिलवाकर स्वयं रोजगार मे लगाना चाहिए
3.श्री विशवकर्मा धीमान समाज के बच्चे अपनी पढ़ाई को आर्थिक तंगी, पारिवारिक कल्ह व पारिवारिक लापरवाही के कारण बीच मे ही छोड देते हैं
4.श्री विशवकर्मा धीमान समाज मे पारिवारिक कल्ह का कारण रोजगार का न होना व आर्थिक तंगी हैं
5.श्री विशवकर्मा धीमान समाज मे कुठां व आपसी भाई चारे कि कमी का कारण, शिक्षा का न होना व साकारात्मक सोच की कमी है
6.श्री विशवकर्मा धीमान समाज के कल्याण के लिए कोई संघ/ समिति/संगठन का होना आवशयक है
7.श्री विशवकर्मा धीमान समाज के संघ/समिति/संगठन पदाधिकारियों का उच्च शिक्षित होना, राजनैतिक भागीदारिता होना व अच्छी वितिय स्थिति का होना आवशयक है
8.श्री विशवकर्मा धीमान समाज के नेता व बुध्दिजीवि वर्ग निःस्वार्थ भाव व लगन से सामाज की समस्याऔ की जानकारी प्राप्त कर उनका समाधान निकालते हैं
9.श्री विशवकर्मा धीमान समाज के लोगो मे समय की कमी, साधनो कि कमी व आर्थिक तंगी आदि मिटिगों मे भागीदारीता न लेने के कारण हैं
10.श्री विशवकर्मा धीमान समाज के लोगो के द्वारा पी जाने वाली शराब के मख्य कारण बेरोजगारी, शिक्षा का न होना, पारिवारिक कल्ह, पारिवारिक लापरवाही, ऊर्जा का स्त्रोत व युवाओं का बढ़ता शोंक है
यहां पर हमारा सवाल है कि समाज के बुद्धिजीवि वर्ग द्वारा परिभाषित की गई उपकल्पनाऐं , क्या धीमान समाज के लोगों मे व्यापक है
वर्तमान अध्ययन मे प्राथमिक आकडे प्रश्नपत्र के माध्यम से प्राप्त किए गए हैं। प्रश्नपत्र मे 10 धीमान समाज से सम्बंधित उपकल्पनाओ को परिभषित किया गया हैं। जिसे धीमान समाज के लोगो से नo 5 मापनी पर 1.पूर्णतः सहमत के लिए, 2.केवल सहमत के लिए ,3.औसत के लिए ,4.असहमत के लिए,5. पूर्णतः असहमत के लिए न0 देकर भरवाया गया है। यह प्रश्नपत्र धीमान समाज जीन्द शहर के 110 प्रतिवादियों पर प्रयोग मे लाया गया।
प्राथमिक आकडों का विशलेषण माध्य(Mean), मानक विचलन (S.D), सह सम्बधं व कारक विश्लेषण(Factor Analysis ) जैसी नविनतम सांख्यिकीय तकनिकों का प्रयोग करके किया गया है। माध्य(Mean) का प्रयोग औसत निकालने के लिए व S.D का प्रयोग आकडों के पृथक्करण के लिए किया गया है कारक विश्लेषण के द्वारा आकडों को कम करके उपकल्पनाओं का परिभाषित किया गया है।
परिणाम व चर्चा
तालिका मे उपकल्पनाओ पर प्रतिवादियों की प्रतिक्रिया को दर्शाया गया है। जिसमें माध्य(Mean) का प्रयोग औसत निकालने के लिए व मानक विचलन (S.D) का प्रयोग आकडों के पृथक्करण के लिए किया गया है प्रतिवादि केवल उपकल्पना न० 2 व 8 को छोड कर अन्य सभी पर सकारात्मक रुप से सहमत है। परन्तु उपकल्पना न० 2 व 8 पर आंछिक रुप से असहमत या औसत हैं यह दर्शाता है कि प्रतिवादि फैसला नही ले पा रहें की वे बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाए व रोजगार में लगाए। इसी तरह ये उपकल्पना न० 8 पर भी नकारात्मक प्रतिक्रिया दर्शातें है। प्रतिवादि सबसे जयादा सहमत उपकल्पना न० 6 पर है। जिसका मानक विचलन भी सबसे कम है यह जनकल्याण के लिए संघ व संगठन के निर्माण से संबन्धित है अतः लोग मजबुत व क्रियाशील संगठन चाहते है। अध्ययन मे स्थयापित किया गया कि समाज के बुद्धिजीवि वर्ग द्वारा परिभाषित की गई उपकल्पनाऐं धीमान समाज के लोगों मे व्यापक है
परन्तु हमारा सवाल है कि धीमान समाज के विकास को कौन से कारक प्रभावित करते हैं? तथा धीमान समाज मे इनके प्रति कितनी जागृति है?
अतः कारक विश्लेषण के द्वारा उपकल्पनाओं को प्रतिवादियों की प्रतिक्रिया व आपसी सम्बन्ध के आधार पर इक्कठा व कम करके कारकों को परिभाषित किया गया है। इस अध्ययन मे 3 कारक मिले है धीमान समाज के विकास को प्रभावित करने वाले 3 कारक “समाजिक समस्याए”,”समाजिक दृष्टिकोण” व “पारिवारिक समस्या व नैतृत्व गुण” है जो की 55% आंतरिक भेद को दर्शाते है। अर्थात धीमान समाज के मात्र 55% लोग समाज के विकास के प्रति जागरुक हैं 26.4% लोग सामाजिक समस्याओं को, 16.9% लोग सामाजिक दृष्टिकोण को व 11.9% लोग पारिवारिक समस्या व नैतृत्व गुण को सामाजिक विकास को प्रभावित करने का कारण मानते है। निकाले गए कारक समूह की लोडिंग .450-.868 श्नेणी के बीच मे है। के० एम० औ० तथा बार्टलेट टेस्ट के अनुसार कारक (Sampling Adequacy.629, sig .000) महत्व के साथ सार्थक हैं कारकों का विवरण इस प्रकार हैः
पहले कारक का नाम सामाजिक समस्याए है यह दर्शाता है धीमान समाज सामाजिक समस्याऔं को लेकर जागरुक है। अध्ययन के अनुसार धीमान समाज के लोगों के द्वारा मिटिगों मे भागीदारीता न लेने की समस्या सबसे ज्यादा (लोडिंग .868) सामने निकल के आई है नशे की समस्या (लोडिंग .833) व समाज मे बच्चों की पढ़ाई बीच मे छोडने की समस्या (लोडिंग .619) भी अन्य बडी समस्या है। एम० डी० विश्वविद्यालय के प्रो० डा० खजान सिहं के अनुसार लोगों मे नशे की प्रवृति हावी हो रही है उन्होने इसका कारण निराशाजनक सोच, बेरोजगारी, पारिवारिक लापरवाही व ग्लैमर जिंदगी के प्रति आकर्षण के भाव को बताया है। (जींद, जागरण संवाद, 2007) पिछले दिनों सर्व शिक्षा अभियान के तहत कराए गए सर्वेक्षण के आधार पर जींद जिले में 4456 ऐसे बच्चे है, जो स्कूलों में नहीं पढ़ रहे है। उन्होंने दोहराया कि आर्थिक गरीबी अथवा माता-पिता का शिक्षा के प्रति सकारात्मक रुझान न होना भी इसका कारण हो सकता है। (जींद, जागरण संवाद, 2007)
दुसरे कारक मे समाजिक दृष्टिकोण, के नाम यह दर्शाता है धीमान समाज विकास चाहता है यह विकास मे उच्च शिक्षा (लोडिंग .737) को साहयक मानता है। धीमान समाज के कल्याण व विकास के लिए कोई संघ/ समिति/संगठन का होने आवशयकता(लोडिंग .604) पर बल दिया गया है धीमान समाज मे कुठां व आपसी भाई चारे की कमी (लोडिंग .435) के कारण अपना सामजिक विकास नही कर पा रहा है।
पारिवारिक समस्या व नैतृत्व गुण नo 3 कारक है यह दर्शाता है धीमान समाज पारिवारिक समस्याऔं का समाधान (लोडिंग .626) संगठन के माध्यम से चाहता है इसके लिए यह धीमान समाज के संघ/समिति/संगठन पदाधिकारियों का उच्च शिक्षित होना व राजनैतिक भागीदारिता होना (लोडिंग .762) आवशयक मानता है
अंत मे हम यह स्थयापित करने मे कामयाब हो गये कि धीमान समाज के विकास को कौन से कारण प्रभावित करते हैं ये है सामाजिक समस्याए, सामाजिक दृष्टिकोण तथा पारिवारिक समस्या व नेतृत्व गुण।
प्रस्ताव
शहरी क्षेत्र मे धीमान समाज के विकास के प्रति मात्र 55% जागृति का पाया जाना चिंता का विषय है गावों में तो स्थिति इस से भी बुरी होगी अतः समाज के वरिष्ठ नेतृत्व व बुध्दिजीवि वर्ग से हमारे प्रस्ताव है की आकडो के अनुसार समाज के विकास के लिए बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाना आवश्यक है। श्री विश्वकर्मा धीमान समाज के नेता व बुध्दिजीवि वर्ग निःस्वार्थ भाव व लग्न से सामाज की समस्याऔ की जानकारी प्राप्त कर उनका समाधान निकालना भी सामज के विकास मे सहायक है। समाज मे बच्चों की पढ़ाई बीच मे छोडने की समस्या का समाधान सामुहिक कार्यकर्मों के माध्यम से किया जा सकता है। नशा, पारिवारिक कल्ह व बेरोजगारी भी बच्चों की शिक्षा को प्रभावित करती है पारिवारिक कल्ह को दुर करने मे सामाज के नेता व बुध्दिजीवि वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है इसलिए इनका उच्च शिक्षित होना व राजनैतिक भागीदारिता होना अवशयक है। धीमान समाज के लोगों के द्वारा मिटिगों मे भागीदारीता न लेने के कारण, सामाज के नेता व बुध्दिजीवि वर्ग इनकी समस्याऔं का समाधान निकालने मे असमर्थ हैं। लोगों के द्वारा मिटिगों मे भागीदारीता न लेने के मुख्य कारण नशे की समस्या है समाज मे व्यापक नशे की समस्या मे समाज सुधार समिति व अन्य जनकल्याण की संस्था बनाकर सुधार लाया जा सकता है।
विश्वकर्मा समाज से आग्रह है। कि इस समाज के कर्मठ और ईमानदार लोगों को खुलकर राजनीति में आना चाहिए ताकि समाज को एक नई दिशा देकर उन्नति की गति तेज की जा सके। इसमें संदेह नही है की समाज के लोगों के पास समय की कमी है, समझ की कमी नही, अगर ये देश का निर्माण कर सकते है तो देश की बागडोर भी बडी कुशलता से सम्भाल सकते है। (अमरजीत सिंह, 2001)
अध्ययन की परिमियत्ता
इस अध्ययन मे सार्थक किये गए कारकों का भविष्य मे आपसी संबन्ध निकाल कर प्रभाषित किया जा सकता हैं अतः भविष्य मे इन कारणों पर आकडों का fo’ysÔ.k करके सामाजिक व पारिवारिक समस्याओं का समाधान, सामाजिक दृष्टिकोण मे परिवर्तन, तथा नेतृत्व गुणों के विकास से संबन्धित अध्ययन किया जा सकता है। भविष्य मे और बडे सैम्पल मे विभिन्न उपकल्पनाओं के साथ अन्य क्षेत्रों को भी इसमे सम्मलित करके अध्ययन किया जा सकता है
सदंर्भ-
1. सरला दुबे, (1999) “सामाजिक समस्याऍ”, विवेक प्रकाशन
2. स्वामी कल्याण देव (2000), “Jh विश्वकर्मा मन्दिर कुरुक्षेत्र में मूर्ति स्थापना समारोह”, अंगिरा पुत्र, वर्ष 6,अंक 10, पृष्ट 32.
3. रामशरण युयुत्सु (2000), “नरवाना मे Jh विश्वकर्मा पूजा दिवस समारोह की धूम रही,” अंगिरा पुत्र, वर्ष6,अंक 11, पृष्ट 32
4. अमरजीत सिंह (2001), “समय की मांग है कि Jh विश्वकर्मा समाज राजनीति में आगे आये”,अंगिरा पुत्र, वर्ष7, अंक4, पृष्ट7
5. डा लक्ष्मी निधि (2006), “कहते कहते थका, थका न कोई सुनने वाला”, अंगिरा पुत्र , वर्ष 12, अंक 10, पृष्ट 21
6. दिलबाग सिंह पांचाल (2007), “ नेताओं को पद छोड देने चाहिए”, अंगिरा पुत्र , वर्ष १३, अंक ३, पृष्ट ३२
7. इंद्रजीत शर्मा जगदेव (2007), “कुशल नेतृत्व ही संस्थाओं को अच्छे परिणाम दिला सकता है”, अंगिरा पुत्र , वर्ष 13, अंक 11- 12, पृष्ट 38
8. अमर सिंह धीमान (2007), “संगठन से ही समाज मे एकता संभव”, धीमान जाग्रति, अंक 11, पृष्ट 03
9. प्रदीप गोल्याण (2007), “Jh विश्वकर्मा धीमान समाज -दशा व दिशा”, धीमान जाग्रति, अंक 11, पृष्ट 12
10. प्रेमसागर धीमान (2007), “मजबूत संगठन ही आपके अधिकारों को प्राप्त कर सकता है।“, धीमान जाग्रति, अंक 10, पृष्ट 41
11. बचना राम धीमान (2007), “पिछडेपन का कारण नशा”, अंगिरा पुत्र , वर्ष 13, अंक 11-12, पृष्ट 41
12. माघी राम धीमान (2007), “आओ समाज के लिए चिंतन करे”, अंगिरा पुत्र, वर्ष 13, अंक 10, पृष्ट 24
13. सोमदत धीमान (2007), “सामाजिक उत्थान में संगठन एक मार्ग”, धीमान जाग्रति, अंक 10, पृष्ट 27
14. महेन्द्र सिह पंचाल (2007), “Jh विश्वकर्माZ का ऋणी है मानव समाज”, vafxjk iq=] oÔZ 13] vad&11-12] पृष्ट. 5
15. जींद, जागरण संवाद (2007), “जिले के 4456 बच्चे नहीं जाते स्कूलों में”, दैनिक जागरण, दिसम्बर 17.
16. जींद, जागरण संवाद (2007), “जवां हैं नशे का कारोबार”, दैनिक जागरण, दिसम्बर 11.
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